परागण

परागण

पौधों में पराग कण (Pollen grains) का नर-भाग (परागकोष – Anther) से मादा-भाग (वर्तिकाग्र – Stigma) पर स्थानातरण परागण (Pollination) कहलाता है। परागन के उपरान्त निषेचन की क्रिया होती है और प्रजनन का कार्य आगे बढ़ता है।

परागण क्या है?

जब किसी पुष्प का परागकण निकालकर किसी दूसरे पुष्प या फिर किसी दूसरे पौधे के पुष्प तक पहुँचता है, तो इस क्रिया को परागण कहते हैं

परागण की क्रिया दो विधियों द्वारा होती है:-

1 स्वपरागण

2 परपरागण

1 स्वपरागण :- जब परागण की क्रिया किसी पुष्प के परागकोष से परागकण निकालकर उसी पौधे के पुष्प पर परता है तो वह स्वपरागण कहलाता है।

लघुबीजाणुजनन (Microsporogenesis)

परागमातृ कोशिका (Pollen mother cell) से लघुबीजाणु (Microspore) बनने की प्रक्रिया लघुबीजाणुजनन (Microsporogenesis) कहलाती है।

पुष्प के बनने के समय जब पुंकेसर बन रहा होता है । तो इनकी लघुबीजाणुधानियों में बीजाणुजन उत्तक (sporogenous tissue) पाये जाते है ।  इन बीजाणुजन उत्तक (sporogenous tissue) में परागमातृ कोशिकाएँ (PMC) होती है।

परागमातृ कोशिकाओं (PMC) में अर्द्धसूत्री विभाजन से चार अगुणित लघुबीजाणु (n, Microspore) बनते है। जो एक साथ एक ही भिती में व्यवस्थित होते है। जिसे लघुबीजाणु चतुष्क (tedrad) कहते है।

परागण
परागण

लघुबीजाणु चतुष्क (tedrad) की भित्ति कैलोज नामक कार्बोहाइड्रेट से बनी होती है।

लघुबीजाणु चतुष्क (tedrad) की प्रत्येक कोशिका में समसूत्री विभाजन (mitosis) होता है, जिससे दो कोशिका युक्त (कायिक व जनन कोशिका) परागकण (Pollen) का निर्माण होता है।

परागकण का स्फुटन (Dehisence of Pollen Grain)

परागकोष (anther) से परागकण (pollen grain) का बाहर निकलना स्फुटन (dehisence) कहलाता है। यह निम्न प्रकार होता हैं-

परागकोश की टेपीटम व मध्यपरत (मिडिल लेयर) नष्ट हो जाती है।

अन्तथीसियम की कोशिकाओं में जल की हानि से उनकी कोशिका भिती सिकुड़ जाती है। जिससे इन कोशिकाओ में स्टोमियम (stomium) पर दबाव पड़ता है। जिससे इन कोशिकाओ में दरार हो जाती है एव परागकण मुक्त हो जाते है।

परागकण (Pollen grain)

यह नर युग्मकोद्भिद (male gamete) होता है। यह गोलाकार तथा इसका व्यास 25-50mm होता है।

परागकण में दो भित्तियाँ (layer) होती है। जिनको चोल कहते हैं-

  1. बाह्यचोल (Exin)
  2. अन्तचोल (Intine)

बाह्यचोल (Exin)

यह बाहरी भित्ति (outer layer) है। यह कठोर व स्पोरोपोलेनिन (sporopolllenin) की बनी होती है।

स्पोरोपोलेनिन (Sporopollenin) एक कार्बनिक पदार्थ है जो उच्च तापमान , अम्लों व क्षारको के प्रति अधिक प्रतिरोधी होता है। इसका पाचन करने वाला एंजाइम अभी तक खोजा नहीं गया है।

बाह्यचोल असतत (Discontinous) होती है। इस पर कुछ छिद्र (pore) पाए जाते है। जिन्हें जनन छिद्र (germinal pore) कहते है। इस पर स्पोरोपोलेनिन अनुपस्थित है ।

अन्तचोल (Intine)

यह आंतरिक भित्ति (inner layer) है। यह पतली व सतत (Continous) होती है। यह सेलुलोज व पेक्टिन की बनी होती है।

अन्तचोल (Intine) में जनन छिद्र अनुपस्थित होते है।

 

परिपक्व परागकण में दो प्रकार की कोशिकाएँ होती हैं-

  1. कायिक कोशिका (vegetative cell)
  2. जनन कोशिका (generative cell)

कायिक कोशिका (vegetative cell)

ये बड़ी व अनियमित केन्द्रकवाली कोशिका है। तथा खाघ प्रदार्थ युक्त होती है। यह जनन छिद्र द्वारा निकलने वाली पराग नलिका (pollen tube) का निर्माण करती है। ये अगुणित (Haploid) होती है।

जनन कोशिका (generative cell)

ये छोटी तथा तर्कुरूपी (cone shape) तथा कायिका कोशिका के जीवद्रव्य में तेरती रहती है। ये अगुणित (Haploid) होती है।

जनन कोशिका में समसूत्री विभाजन (mitosis) से दो नर युग्मक (male gamete) बनते है। जो दोहरे निषेचन में भाग लेते है।

पराग उत्पाद(pollen product)

परागकण पोषक पदार्थ युक्त होते है। इसका उपयोग कार्यक्षमता वृद्धक दवाइयाँ बनाने में किया जाता है। जिन्हें पराग उत्पाद कहते है।

घोड़ो व एथलीट की कार्यक्षमता बढ़ाने के लीए पराग उत्पादो का प्रयोग करते है।

परागकण में उपस्थित असंतृप्त वसा अम्ल UV किरणों से सुरक्षा करते है। अतः इनका प्रयोग त्वचा क्रीम बनाने में किया जाता है।

परागकणों की जीवन क्षमता (Viability of Pollen Grain)

वह अवधि जिसमें परागकण कार्यक्षम हो या निषेचन में भाग लेने की क्षमता रखते हो, परागकणों की जीवन क्षमता (pollen viability) कहलाती है। यह तापमान व आर्दता पर निर्भर करती है। जो 30 मिनट से कई महीनों तक होती है। जैसे-

अनाजो में 30 मिनट

मालवेसी व राजेसी कई महीने, पुरातत्व खुदाई के दौरान खोजा गया खजूर फियोनिक्स डेक्टलिफेरा 2000 सालों बाद अंकुरित हुआ था।

परागकिट (pollen kit)

टेपीटम द्वारा स्त्रावित चिपचिपा रासायनिक पदार्थ जो परागकणों को कीटो से चिपकने में सहायता करता है। परागकिट (pollen kit) कहलाता है।

परागपुटी (pollen sec)

चारों लघुबीजाणुधानियां विकसित होकर एक थैली या धानी का निर्माण करते है। जिसमें परागकण ठसाठस भरे रहते है इस थैली को परागपुटी (pollen sec) कहते है।

परागकणों द्वारा एलर्जी (Pollen grain as an allergen)

परागकणों में उपस्थित प्रोटीन मानव में एलर्जी उत्पन्न करती है। ऐसे परागकणों को एलर्जन कहते है। जैसे गाजर घास (पार्थोनियम) के परागकण द्वारा मानव में एलर्जी उत्पन्न की जाती है।